नवरात्रि : नौ देवी पूजा आराधना, मंत्र, पूजा विधि, आरती | NAVRATRI : NAU DEVI ARADHANA, MANTRA, POOJA VIDHI, AARTI

हिन्दू नव वर्ष | HINDUTVA NEW YEAR | नौ दिन में माता को ऐसे करे प्रसन्न | इस तरह पूजा करने से मिलते है मनवांछित फल |

विक्रम संवत 2079 हिन्दू नववर्ष की बधाई

नए वर्ष का ये प्रभात, बस खुशियां ही खुशियां लाए,

मिट जाये बस मन का अंधेरा, हर पल बस रोशन हो जाए.

हिन्दू पंचागों के अनुसार वर्ष में दो बार नवरात्रि का त्यौहार या उत्सव जो भी कह ले मनाया जाता है | एक बार में बसंत ऋतु में और एक बार शरद ऋतु में | बसंत ऋतु का नवरात्रि कई तरीके से मायने रखता है क्योकि ये हिन्दू धर्म का पहला महीना होता है हालाँकि चैत्र की शुरुआत तो होली के साथ ही हो जाती है पर हिन्दू धर्मं में किसी भी शुभ कार्य को शुक्ल पक्ष में करने की प्रथा है इसलिए चैत्र के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस को हम नये वर्ष के रूप में मनाते है | चैत्र नवरात्र से ग्रीष्म ऋतु की भी शुरुआत हो जाती है। मान्यता है कि चैत्र नवरात्रि की साधना आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाती है और आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाली है।

हेमाद्रि के ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और इसी दिन सूर्य देव पहली बार उदित हुए थे। 2 अप्रैल 2022 से शुरू होने वाले विक्रम संवत 2079 के राजा शनिदेव हैं और मंत्री गुरु हैं। नवरात्रि चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू हो जाती है। जो कि इस साल 2 अप्रैल 2022 से शुरू हो रही है और जिसका समापन 10 अप्रैल 2022 को होगा। इस बार नवरात्र की विशेष बात ये है कि इस वर्ष किसी भी तिथि का क्षय नहीं हो रहा है। इसलिए इस बार नवरात्रि पूरे नौ दिनों की होगी।

गौर करने वाली बात ये है की विश्व की सारी सभ्यताएं अपने नव वर्ष को खा पी कर और घूम कर मनाती है पर सनातन सभ्यता में उपवास रखने की परम्परा है और हम इस दिन की शुरुआत माँ के पूजन अथवा देवी पूजन के साथ करते है जो कि अपने आप में अनूठा है| इसके साथ साथ फसलो की कटाई हो चुकी होती है जो किसान अपने परिश्रम से अन्न उपजाते हैं उनके लिए भी ये मौसम खास होता है वो भी देवी पूजा करके माता को धन्यवाद अर्पित करते हैं | इस वर्ष हम सनातन पंचांग जिस की शुरुआत विक्रमादित्य ने की थी उसके दो हजार उन्यासियवे वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं विक्रमादित्य काल में शुरू हुए इस साल की वजह से हम इसे विक्रम संवत या शक संवत भी कहते हैं | आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक बधाइयाँ आप सभी का जीवन सुखमय और नीरोग रहे इसकी कामना करते हैं|

नवरात्रि उत्सव : किस दिन किस देवी की पूजा की जाती है |

Navratri Me Nau Deviyon ki Puja

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

नवरात्रि में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस दौरान विधि-विधान से मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। नवरात्रि के 9 दिनों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, स्कन्द माता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।| ये सभी माँ दुर्गा के ही रूप है इसलिए इन्हें नव दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है| माता ने इन अलग अलग रूपों को धारण कर विभिन्न राक्षसों का विनाश किया था और धरती पर धर्म की स्थापना भी की थी | ब्रह्माण्ड जिस शक्ति से संचालित होती है वो आदि शक्ति परा शक्ति माँ जगदम्बा है जिनकी आराधना विश्व की शांति के लिए किया जाता है इन सभी रूपों के बारे में विस्तार से जानते हैं |


नवरात्रि की प्रथम देवी – शैलपुत्री | Maa Shailputri Pratham Din | नव रात का पहला दिन | NAVRAAT KA PAHLA DIN

maa shailputri pratham

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा, सभी भाग्य का प्रदाता, देवी शैलपुत्री द्वारा शासित होता है और चंद्रमा के किसी भी बुरे प्रभाव को आदि शक्ति के इस रूप की पूजा करने से दूर किया जा सकता है. देवी माँ दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम स्वरुप है  ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय  के घर पुत्री के रूप में जन्म होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। पहले दिन उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।

कथा | KATHA | STORY

प्रजापति दक्ष अपनी शक्तियों को लेके बहुत अहंकार में था एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इस यज्ञ में उसने सभी देवताओं को आमंत्रित किया, परन्तु भगवन्न शंकर को यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती जो कि शिव जी की पत्नी थी, ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन व्यग्र हो उठा।

शंकर जी ने उन्हें यज्ञ में ना जाने के लिए बहुत प्रकार से समझाया मगर सती पिता का यज्ञ देखने और वहाँ जाकर अपनी माता और बहनों से मिलने की इच्छा कम न हो सकी । सती की प्रबल इच्छा को देखते हुए भगवान शंकर जी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।

पिता के घर पहुँचने पर सती का कोई सम्मान नहीं हुआ इसके अल्वा सभी भगवान शंकर का उपहास उडा रहे थे परिवार वालो के इस व्यव्हार से सती को बहुत दुःख का अनुभव हुआ वे शंकर जी की बात ना मानकर बड़े ही दुविधा में फंस गई थी

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया। सती के मृत शरीर को लेके भगवन शंकर तांडव करने लगे जिस से सृष्टि का नाश होने लगा तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर को बावन भागो में विभक्त कर दिया शरीर के जो अंग जहाँ गिरे वहाँ शक्ति पीठ की स्थापना हुई

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

बहुत ही कठिन तप के पश्चात् ‘शैलपुत्री’ देवी का विवाह भी शंकर जी के साथ हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।

शैलपुत्री आराधना मन्त्र | SHAILPUTRI ARADHANA MANTRA | SHAILPUTRI SANSKRIT CHANTING

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम् ।

कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥

या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।

वन्दे वाच्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

माँ शैलपुत्री की आरती | MA SHAILPUTRI KI AARTI

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।

शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे। ‌ जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।

उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला‌ के। गोला गरी का भोग लगा के।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।

मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।


नवरात्रि की द्वितीय देवी (Navratri Dwitiya Din) – नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रम्ह्चारिणी

maa brahmacharini dwitiya

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. ऐसा माना जाता है कि सभी भाग्य के प्रदाता भगवान मंगल, देवी ब्रह्मचारिणी द्वारा शासित हैं. भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन साधक अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तप और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तपस्या का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है। इस दिन साधक कुंडलिनी शक्ति को जगाने के लिए भी साधना करते हैं। जिससे उनका जीवन सफल हो सके और अपने सामने आने वाली किसी भी प्रकार की मुश्किलों का सामना आसानी से कर सकें।

ब्रम्ह्चारिणी की कथा | BRAMHACHARINI KI KATHA | STORY OF BRAMHACHARINI

नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रम्ह्चारिणी की पूजा होती है। ब्रम्ह्चारिणी देवी को समस्त विद्याओं का ज्ञाता माना गया है। देवी ब्रम्ह्चारिणी भवानी माँ दुर्गा का दूसरा स्वरुप है। ब्रम्ह्चारिणी ब्रह्माण्ड की रचना करने वाली। ब्रह्माण्ड को जन्म देने के कारण ही देवी के दूसरे स्वरुप का नाम ब्रम्ह्चारिणी पड़ा। देवी के ब्रम्ह्चारिणी रूप में ब्रम्हा जी की शक्ति समाई हुई है। माना जाता है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय ब्रम्हा जी ने मनुष्यों को जन्म दिया। समय बीतता रहा , लेकिन ब्रह्माण्ड का विस्तार नहीं हो सका। ब्रम्हा जी भी आश्चर्य में पड़ गए। देवताओं के सभी प्रयास व्यर्थ होने लगे। सारे देवता निराश हो उठें तब ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है। भोले शंकर बोले कि बिना देवी की शक्ति के संसार का विस्तार संभव नहीं है। सकल संसार के विस्तार हेतु माँ जगदम्बा का आशीर्वाद प्राप्त करना होगा , उन्हें प्रसन्न करना होगा। सभी देवता गण माँ भवानी की शरण में गए तब देवी ने ब्रह्माण्ड का विस्तार किया। उसके बाद से ही नारी शक्ति को माँ का स्थान मिला और गर्भ धारण करके शिशु जन्म कि नीव पड़ी। हर बच्चे में १६ गुण होते हैं और माता पिता के ४२ गुण होते हैं। जिसमें से ३६ गुण माता के माने जातें हैं।

ब्रम्ह्चारिणी आराधना मंत्र | BRAMHACHARINI ARADHANA MANTRA SHLOKA | SANSKRIT SHLOKA BRAMHACHARINI

वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥

गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।

धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥

परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।

पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।  

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

आरती ब्रम्हचारिणी माता की | AARTI BRAMHACHARINI MATA KI

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।  जय चतुरानन प्रिय सुख दाता। 

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।  ज्ञान सभी को सिखलाती हो। 

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।  जिसको जपे सकल संसारा। 

जय गायत्री वेद की माता।  जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता। 

कमी कोई रहने न पाए।  कोई भी दुख सहने न पाए। 

उसकी विरति रहे ठिकाने।  जो ​तेरी महिमा को जाने। 

रुद्राक्ष की माला ले कर।  जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर। 

आलस छोड़ करे गुणगाना।  मां तुम उसको सुख पहुंचाना। 

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।  पूर्ण करो सब मेरे काम। 

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।  रखना लाज मेरी महतारी।


नवरात्रि की तृतीय देवी – माँ चंद्रघंटा (Navratri Tritiya Din) | NAVRATRI TEESRA DIN MA CHANDRAGHANTA

Maa Chandraghanta Tritiya

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है. ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह देवी चंद्रघंटा द्वारा शासित है. माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग सोने के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है

देवी चंद्रघंटा की पौराणिक कथा | DEVI CHANDRAGHANTA KI PAURANIK KATHA | VAIDIK STORY OF GODDESS CHANDRAGHANTA

प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला। असुरों का स्वामी महिषासुर था और देवताओं के स्वामी भगवान इंद्र देव थे। महिषासुर ने देवतालोक पर विजय प्राप्त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्वर्ग लोक पर राज करने लगा। इसे देख सभी देवी देवता चिंतित हो उठे और त्रिदेवों के पास जा पहुंचे। देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, सूर्य, चंद्र और वायु समेत अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और देवतागण पृथ्वी लोक पर विचरण कर रहे हैं।

देवताओं की बात सुन ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। क्रोध के कारण तीनों देवों के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई और देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा में जाकर मिल गई। दसों दिशाओं में व्याप्त होने के बाद इस ऊर्जा से मां भगवती का अवतरण हुआ। शंकर भगवान ने देवी को अपना त्रिशूल भेट किया। 

भगवान विष्णु ने भी उनको चक्र प्रदान किया। इसी तरह से सभी देवता ने माता को अस्त्र-शस्त्र देकर सजा दिया। इंद्र ने भी अपना वज्र एवं ऐरावत हाथी माता को भेंट किया। सूर्य ने अपना तेज, तलवार और सवारी के लिए शेर प्रदान किया। युद्धभूमि में देवी चंद्रघंटा ने महिषासुर नामक दैत्य का वध किया। इनको महिषासुर मर्दनी के नाम से भी जाना जाता है

देवी चंद्रघंटा स्तुति आराधना मंत्र | DEVI CHANDRAGHANTA STUTI ARADHANA SHLOKA

पिंडजप्रवरारूढ़ा,चंडकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं,चंद्रघंटेति विश्रुता।।

आरती चंद्रघंटा देवी की | AARTI CHANDRAGHANTA DEVI KI

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम, पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।

चंद्र समान तुम शीतल दाती, चंद्र तेज किरणों में समाती।

क्रोध को शांत करने वाली, मीठे बोल सिखाने वाली।

मन की मालक मन भाती हो, चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।

सुंदर भाव को लाने वाली, हर संकट मे बचाने वाली।

हर बुधवार जो तुझे ध्याये, श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।

मूर्ति चंद्र आकार बनाएं, सन्मुख घी की ज्योति जलाएं।

शीश झुका कहे मन की बाता, पूर्ण आस करो जगदाता।

कांचीपुर स्थान तुम्हारा, करनाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटूं महारानी, भक्त की रक्षा करो भवानी


नवरात्रि की चतुर्थ देवी – माँ कुष्मांडा (Navratri Chaturth Din) नवरात्रि के चौथे दिन करें माँ कुष्मांडा की आराधना

Maa Kushmanda Chaturtha

नवरात्रि पूजा  के चौथे दिन कुष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘अनाहत’ चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए।

माँ कुष्मांडा की कथा | MA KUSHMANDA KI KATHA | STORY OF MA KUSHMANDA

शास्त्रों के अनुसार जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा हैं। इनका निवास सौरमंडल भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।

इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन शेर  है।

कुष्मांडा अराधना स्तुति मंत्र | KUSHMANDA AARADHANA STUTI MANTRA SHLOKA

सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्‍मांडा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

आरती कुष्मांडा माँ की | AARTI KUSHMANDA MA KI

कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥

पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी माँ भोली भाली॥

लाखों नाम निराले तेरे । भक्त कई मतवाले तेरे॥

भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥

सबकी सुनती हो जगदंबे। सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥

तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥

माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥

तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा॥

मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥


नवरात्रि की पांचवी देवी – माँ स्कंदमाता (Navratri Pachwa Din) FIFTH DAY OF NAVRATRI

Maa Skandmata Pancham

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। मां दुर्गा का पंचम रूप स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कंद कुमार [कार्तिकेय] की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। भगवान स्कंद जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। स्कंद मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजाएं हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कंद को गोद में पकड़े हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। मां का वर्ण पूर्णत: शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है।

स्कंदमाता की कथा | SKANDMATA KI KATHA | STORY OF SKANDMATA

भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण माँ दुर्गाजी के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है।

स्कंदमाता स्तुति आराधना मंत्र | SKANDMATA STUTI ARADHANA MANTRA SHLOKA

या देवी सर्वभूतेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

ऐसे करे माँ स्कंदमाता की आरती | AISE KARE MA SKANDMATA KI AARTI

जय तेरी हो स्कंद माता। पांचवा नाम तुम्हारा आता।।

सब के मन की जानन हारी। जग जननी सब की महतारी।।

तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं। हरदम तुम्हें ध्याता रहूं मैं।।

कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा।।

कही पहाड़ो पर हैं डेरा। कई शहरों में तेरा बसेरा।।

हर मंदिर में तेरे नजारे। गुण गाये तेरे भगत प्यारे।।

भगति अपनी मुझे दिला दो। शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो।।

इंद्र आदि देवता मिल सारे। करे पुकार तुम्हारे द्वारे।।


नवरात्रि की छठी देवी – माँ कात्यायनी (Navratri Chhathwa Din) | SIXTH DAY OF NAVRATRI

Maa Katyayani Chhatha

कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी दुर्गा (शक्ति) के नौ रूपों में छठवीं रूप हैं।

‘कात्यायनी’ नाम अमरकोश में माँ पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हेेमावती व ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं।  स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं , जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्केकंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है

देवी कात्यायनी की पौराणिक कथा | DEVI KATYAYANI KI PAURANIK VAIDIK KATHA

माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराशक्ति की बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर  का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।

ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। अश्विन कृष्ण चतुर्दशी  को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था।माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।

माँ कात्यायनी स्तुति आराधना मंत्र | MA KATYAYANI STUTI ARADHANA MANTRA SHLOKA

1. या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

2. ॐ कात्यायिनी देव्ये नमः

3. कात्यायनी महामाये , महायोगिन्यधीश्वरी।

नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।

4. चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना।

कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानव घातिनि।।

इस आरती को गा कर करें देवी कात्यायनी को प्रसन्न ( माँ कात्यायनी की आरती ) | MA KATYAYANI AARTI |

जय कात्यायनि माँ, मैया जय कात्यायनि माँ। उपमा रहित भवानी, दूँ किसकी उपमा॥

मैया जय कात्यायनि….

गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ। वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हाँ॥

मैया जय कात्यायनि….

कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी। शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी॥

मैया जय कात्यायनि….

त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुँचे, अच्युत गृह। महिषासुर बध हेतू, सुर कीन्हौं आग्रह॥

मैया जय कात्यायनि….

सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित। जन्म लियो कात्यायनि, सुर-नर-मुनि के हित॥

मैया जय कात्यायनि….

अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि। पूजे ऋषि कात्यायन, नाम काऽऽत्यायिनि॥

मैया जय कात्यायनि….

अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा। नाम पड़ा रणचण्डी, मरणलोक न्यारा॥

मैया जय कात्यायनि….

दूजे कल्प संहारा, रूप भद्रकाली। तीजे कल्प में दुर्गा, मारा बलशाली॥

मैया जय कात्यायनि….

दीन्हौं पद पार्षद निज, जगतजननि माया। देवी सँग महिषासुर, रूप बहुत भाया॥

मैया जय कात्यायनि….

उमा रमा ब्रह्माणी, सीता श्रीराधा। तुम सुर-मुनि मन-मोहनि, हरिये भव-बाधा॥

मैया जय कात्यायनि….

जयति मङ्गला काली, आद्या भवमोचनि। सत्यानन्दस्वरूपणि, महिषासुर-मर्दनि॥

मैया जय कात्यायनि….

जय-जय अग्निज्वाला, साध्वी भवप्रीता। करो हरण दुःख मेरे, भव्या सुपुनीता॥

मैया जय कात्यायनि….

अघहारिणि भवतारिणि, चरण-शरण दीजै। हृदय-निवासिनि दुर्गा, कृपा-दृष्टि कीजै॥

मैया जय कात्यायनि….

ब्रह्मा अक्षर शिवजी, तुमको नित ध्यावै। करत ‘अशोक’ नीराजन, वाञ्छितफल पावै॥

मैया जय कात्यायनि….


नवरात्रि की सातवी देवी – माँ कालरात्रि (Navratri Satwa Din) | SEVENTH DAY OF NAVRATRI

Maa Kalratri Satva Din

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. ऐसा माना जाता है कि शनि ग्रह देवी कालरात्रि द्वारा शासित हैं. माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गा पूजा  के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। देवी कालात्रि को व्यापक रूप से माता देवी – काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृित्यू, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालरात्री के अन्य कम प्रसिद्ध नामों में हैं | नवरात्रि के सातवें दिन को महासप्तमी के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन मां कालरात्रि की पूजा करने का विधान है. मां कालरात्रि की पूजा करने से भूतप्रेत भी भाग जाते हैं. मां कालरात्रि बेहद शक्तिशाली हैं, जो लोग विधि विधान से मां कालरात्रि की पूजा अर्चना करता है, उसे संकटों से मुक्ति मिल जाती है. इसीलिए इन्हें शुभकंरी माता के नाम से भी पुकारते हैं

माँ कालरात्रि की पौराणिक कथा ( MA KALRATRI KI PAURANIK KATHA | STORY )

पौराणिक कथा के मुताबिक दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में अपना आंतक मचाना शुरू कर दिया तो देवतागण परेशान हो गए और भगवान शंकर के पास पहुंचे. तब भगवान शंकर ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए कहा. भगवान शंकर का आदेश प्राप्त करने के बाद पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध किया. लेकिन जैसे ही मां दुर्गा ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त की बूंदों से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए. तब मां दुर्गा ने मां कालरात्रि के रूप में अवतार लिया. मां कालरात्रि ने इसके बाद रक्तबीज का वध किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया.

कालरात्रि स्तुति आराधना मंत्र (KALRATRI STUTI ARADHANA SHLOKA MANTRA )

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

इस आरती से करे माँ कालरात्रि को प्रसन्न (माँ कालरात्रि की आरती ) | MA KALRATRI KI AARTI

कालरात्रि जय जय महाकाली काल के मुंह से बचाने वाली

दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा महा चंडी तेरा अवतारा

पृथ्वी और आकाश पर सारा महाकाली है तेरा पसारा

खंडा खप्पर रखने वाली दुष्टों का लहू चखने वाली

कलकत्ता स्थान तुम्हारा सब जगह देखूं तेरा नजारा

सभी देवता सब नर नारी गावे स्तुति सभी तुम्हारी

रक्तदंता और अन्नपूर्णा कृपा करे तो कोई भी दु:ख ना

ना कोई चिंता रहे ना बीमारी ना कोई गम ना संकट भारी

उस पर कभी कष्ट ना आवे महाकाली मां जिसे बचावे

तू भी ‘भक्त’ प्रेम से कह कालरात्रि मां तेरी जय जय |


नवरात्रि की आठवी देवी – माँ महागौरी (Navratri Aathwa Din) | EIGHTH DAY OF NAVRATRI

Maa Mahagauri Aathwa Din

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है| ऐसा माना जाता है कि राहु ग्रह देवी महागौरी द्वारा शासित है | इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’ इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।

महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

माँ महागौरी की कथा | MA MAHAGAURI KI KATHA |

माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं।

एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ गया । देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार किये और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोये तब देवी बीजली के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो गयी तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।

महागौरी स्तुति आराधना मंत्र | MAHA GAURI STUTI ARADHANA MANTRA SHLOKA |


  1- श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।  

2- या देवी सर्वभू‍तेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।  

महागौरी स्तोत्र :  

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥  

सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।

डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥  

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

महागौरी माता की आरती | MAHAGAURI AARTI

जय महागौरी जगत की माया।   जया उमा भवानी जय महामाया।।  

हरिद्वार कनखल के पासा।   महागौरी तेरा वहां निवासा।।  

चंद्रकली और ममता अंबे।   जय शक्ति जय जय मां जगदंबे।।  

भीमा देवी विमला माता।   कौशिकी देवी जग विख्याता।।

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।   महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा।।  

सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया। उसी धुएं ने रूप काली बनाया।।  

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।   तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया।।  

तभी मां ने महागौरी नाम पाया।   शरण आनेवाले का संकट मिटाया।।  

शनिवार को तेरी पूजा जो करता।   मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता।।  

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।   महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो।।


नवरात्रि की नौवी व् अंतिम देवी – माँ सिद्धिदात्री (Navratri Nauva Din) | NINTH AND LAST DAY OF NAVRATRI

Maa Siddhidatri Nauva Din

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

सिद्धिदात्री की कथा | SIDDHIDATRI KI KATHA STORY |

एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की कठोर तपस्या कर आठों सिद्धियों को प्राप्त किया था। साथ ही मां सिद्धिदात्री की कृपा ने भगवान शिव का आधा शरीर देवी हो गया था और वह अर्धनारीश्वर कहलाए। मां दुर्गा का यह अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप है।

शास्त्रों के अनुसार, देवी दुर्गा का यह स्वरूप सभी देवी-देवताओं के तेज से प्रकट हुआ है। कहते हैं कि दैत्य महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवतागणम भगवान शिव और प्रभु विष्णु के पास गुहार लगाने गए थे। तब वहां मौजूद सभी देवतागण से एक तेज उत्पन्न हुआ। उस तेज से एक दिव्य शक्ति का निर्माण हुआ। जिन्हें मां सिद्धिदात्री के नाम से जाते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार मां सिद्धिदात्री के पास अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व सिद्धियां हैं। माता रानी अपने भक्तों को सभी आठों सिद्धियों से पूर्ण करती हैं। मां सिद्धिदात्री को जामुनी या बैंगनी रंग अतिप्रिय है। ऐसे में भक्त को नवमी के दिन इसी रंग के वस्त्र धारण कर मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से माता की हमेशा कृपा बनी रहती हैं।

आठ सिद्धियों के नाम | AATH SIDDHIYO KE NAAM

  1. अणिमा
  2. महिमा
  3. गरिमा
  4. लघिमा
  5. प्राप्ति
  6. प्राकाम्य
  7. ईशित्व
  8. वशित्व

सिद्धिदात्री स्तुति आराधना मंत्र | SIDDHIDATRI STUTI ARADHANA MANTRA |

अमल कमल संस्था तद्रज:पुंजवर्णा, कर कमल धृतेषट् भीत युग्मामबुजा च।

मणिमुकुट विचित्र अलंकृत कल्प जाले; भवतु भुवन माता संत्ततम सिद्धिदात्री नमो नम:।


नवरात्रि के अंतिम दिन इस आरती से करे माँ सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना (माँ सिद्धिदात्री की आरती ) | MA SIDDHIDATRI KI AARTI |

जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता तू भक्तों की रक्षक  तू दासों की माता, 

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि तेरे नाम से मन की होती है

शुद्धि कठिन  काम  सिद्ध  कराती  हो  तुम हाथ  सेवक  के  सर  धरती  हो  तुम,

तेरी  पूजा  में  न  कोई  विधि  है तू  जगदंबे  दाती  तू  सर्वसिद्धि  है

रविवार  को  तेरा  सुमरिन  करे  जो तेरी  मूर्ति  को  ही  मन  में  धरे  जो, 

तू  सब  काज  उसके  कराती  हो  पूरे कभी  काम  उस  के  रहे  न  अधूरे

तुम्हारी  दया  और  तुम्हारी  यह  माया रखे  जिसके  सर  पैर  मैया  अपनी  छाया,

सर्व  सिद्धि  दाती  वो  है  भाग्यशाली जो  है  तेरे  दर  का  ही  अम्बे  सवाली

हिमाचल  है  पर्वत  जहां  वास  तेरा महानंदा मंदिर में है वास  तेरा,

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता वंदना है सवाली तू जिसकी दाता.


दुर्गा चालीसा (Navratri Durga Chalisa)

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ संतन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपू मुरख मौही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।

जब लगि जिऊं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

दोहा॥

शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे नि:शंक ।

मैं आया तेरी शरण में, मातु लिजिये अंक ॥ 


माँ दुर्गा की आरती ( जगजननी जय जय ) | MA DURGA KI SABSE SUNDAR AARTI

जगजननी जय! जय!! माँ! जगजननी जय! जय!!

भयहारिणि, भवतारिणि, माँ भवभामिनि जय! जय ॥

जगजननी जय जय..॥

तू ही सत-चित-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा ।

सत्य सनातन सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा ॥

जगजननी जय जय..॥    

तू ही सत-चित-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा ।

सत्य सनातन सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा ॥

जगजननी जय जय..॥

आदि अनादि अनामय, अविचल अविनाशी ।

अमल अनन्त अगोचर, अज आनँदराशी ॥

जगजननी जय जय..॥

अविकारी, अघहारी, अकल, कलाधारी ।

कर्त्ता विधि, भर्त्ता हरि, हर सँहारकारी ॥

जगजननी जय जय..॥

तू विधिवधू, रमा, तू उमा, महामाया ।

मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया ॥

जगजननी जय जय..॥

राम, कृष्ण तू, सीता, व्रजरानी राधा ।

तू वांछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा ॥

जगजननी जय जय..॥

दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकरा ।

अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धरा ॥

जगजननी जय जय..॥

तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू ।

तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू ॥

जगजननी जय जय..॥

सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या, तू शोभाऽऽधारा ।

विवसन विकट-सरुपा, प्रलयमयी धारा ॥

जगजननी जय जय..॥

तू ही स्नेह-सुधामयि, तू अति गरलमना ।

रत्‍‌नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि-तना ॥

जगजननी जय जय..॥

मूलाधारनिवासिनि, इह-पर-सिद्धिप्रदे ।

कालातीता काली, कमला तू वरदे ॥

जगजननी जय जय..॥

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी ।

भेदप्रदर्शिनि वाणी, विमले! वेदत्रयी ॥

जगजननी जय जय..॥

हम अति दीन दुखी माँ!, विपत-जाल घेरे ।

हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे ॥

जगजननी जय जय..॥

निज स्वभाववश जननी!, दयादृष्टि कीजै ।

करुणा कर करुणामयि! चरण-शरण दीजै ॥

जगजननी जय जय..॥ जगजननी जय! जय!!

माँ! जगजननी जय! जय!!

भयहारिणि, भवतारिणि, माँ भवभामिनि जय! जय ॥

जगजननी जय जय..॥


माँ दुर्गा की प्रसिद्ध आरती (अम्बे तु है जगदम्बे काली ) | MA DURGA KI PRASIDDH AARTI

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,

तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

तेर भक्त जानो पर मैया भीड़ पड़ी है भारी,

दानव दल पर टूट पड़ो माँ कर के सिंह सवारी ।

सौ सौ सिंहों से है बलशाली, है अष्‍ट भुजाओं वाली,

दुखिओं के दुखड़े हारती ।

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,

तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

माँ बेटे की है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता,

पूत कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता ।

सबपे करुना बरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली,

दुखिओं के दुखड़े निवारती । ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,

तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

नहीं मांगते धन और दौलत ना चांदी ना सोना,

हम तो मांगे माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना ।

सब की बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली,

सतिओं के सत को सवारती । ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,

तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली।

वरद हस्त सर पर रख दो माँ संकट हरने वाली॥

मैया भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली,

भक्तों के कारज तू ही सारती। ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती,

हम सब उतारे तेरी आरती॥ ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली,

तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।


दुर्गा माता आरती | अम्बे माता आरती ( जय अम्बे गौरी लिरिक्स ) | AMBE JI KI AARTI ( JAY AMBE GAURI )

जय अम्बे गौरी
मैया जय श्यामा गौरी
तुमको निशिदिन ध्यावत
तुमको निशिदिन ध्यावत
हरि ब्रह्मा शिवरी
ॐ जय अम्बे गौरी
जय अम्बे गौरी
मैया जय श्यामा गौरी
तुमको निशिदिन ध्यावत
तुमको निशिदिन ध्यावत
हरि ब्रह्मा शिवरी
ॐ जय अम्बे गौरीमांग सिंदूर विराजित
टीको जगमग तो
मैया टीको जगमग तो
उज्ज्वल से दोउ नैना
उज्ज्वल से दोउ नैना
चंद्रवदन नीको
ॐ जय अम्बे गौरीकनक समान कलेवर
रक्ताम्बर राजै
मैया रक्ताम्बर राजै
रक्तपुष्प गल माला
रक्तपुष्प गल माला
कंठन पर साजै
ॐ जय अम्बे गौरीकेहरि वाहन राजत
खड्ग खप्पर धारी
मैया खड्ग खप्पर धारी
सुर नर मुनिजन सेवत
सुर नर मुनिजन सेवत
तिनके दुखहारी
ॐ जय अम्बे गौरीकानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती
मैया नासाग्रे मोती
कोटिक चंद्र दिवाकर
कोटिक चंद्र दिवाकर
सम राजत ज्योती
ॐ जय अम्बे गौरीशुंभ निशुंभ बिदारे महिषासुर घाती
मैया महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना
धूम्र विलोचन नैना
निशदिन मदमाती
ॐ जय अम्बे गौरीचण्ड-मुण्ड संहारे शोणित बीज हरे
मैया शोणित बीज हरे
मधु कैटभ दोउ मारे
मधु कैटभ दोउ मारे
सुर भयहिन करे
ॐ जय अम्बे गौरीब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी
मैया तुम कमला रानी
अगम निगम बखानी
अगम निगम बखानी
तुम शिव पटरानी
ॐ जय अम्बे गौरीचौंसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरों
मैया नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंगा
बाजत ताल मृदंगा
ओर बाजत डमरू
ॐ जय अम्बे गौरीतुम ही जग की माता तुम ही हो भरता
मैया तुम ही हो भरता
भक्तन की दुख हरता
भक्तन की दुख हरता
सुख संपति करता
ॐ जय अम्बे गौरीभुजा चार अति शोभित वर-मुद्रा धारी
मैया वर मुद्रा धारी
मनवांछित फल पावत
मनवांछित फल पावत
सेवत नर नारी
ॐ जय अम्बे गौरीकंचन ढाल विराजत अगर कपूर बाती
मैया अगर कपूर बाती
श्रीमालकेतु में राजत
श्रीमालकेतु में राजत
कोटि रतन ज्योती
ॐ जय अम्बे गौरीश्री अम्बे जी की आरती
जो कोई नर गावे
मैया जो कोई नर गावे
कहते शिवानंद स्वामी
कहते शिवानंद स्वामी
सुख सम्पति पावे
ॐ जय अम्बे गौरीजय अम्बे गौरी
मैया जय श्यामा गौरी
तुमको निशिदिन ध्यावत
तुमको निशिदिन ध्यावत
हरि ब्रह्मा शिवरी
ॐ जय अम्बे गौरी


महिषासुर मर्दिनी स्त्रोतम | MAHISHASUR MARDINI STROTAM

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदङ्ग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

देवी स्त्रोतम : इसके पाठ से मिलेगा मनवांछित | DEVI STROTAM MANVANCHIT FAL KE LIYE KARE PATH

1- नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नम:।

कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम:।।

2- सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम:।

पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नम:।।

3- सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नम:।

अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नम:।।

4- ज्ञातं मयाsखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं।

त्वत्तोsस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।

शक्तिश्च तेsस्य करणे विततप्रभावा।

ज्ञाताsधुना सकललोकमयीति नूनम्।।

5- विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं।

सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।।

तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च।

भासीन्द्रजालमिव न: किल रंजनाय।।

6- न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति।

व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थिताsसि।

शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोsप्यशक्तो।

बम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन।।

7- प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावै:।

स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि।

अस्त्येव देवि तरसा किल कल्पकाले।

को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य।।

8- त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां।

लोकाश्च ते सुवितता: खलु दर्शिता वै।

नीता: सुखस्य भवने परमां च कोटि।

यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्।।

9- नाहं भवो न च विरिण्चि विवेद मात:।

कोsन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम्।

कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे।

ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे।।

10- अस्माभिरत्र भुवे हरिरन्य एव।

दृष्ट: शिव: कमलज: प्रथितप्रभाव:।

अन्येषु देवि भुवनेषु न सन्ति किं ते।

किं विद्य देवि विततं तव सुप्रभावम्।।

11- याचेsम्ब तेsड़्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं।

चित्ते सदा वसतु रूपमिदं तवैतत्।

नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव।

संदर्शनं तव पदाम्बुजयो: सदैव।।

12- भृत्योsयमस्ति सततं मयि भावनीयं।

त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि।

एषाssवयोरविरता किल देवि भूया-।

द्वयाप्ति: सदैव जननीसुतयोरिवार्ये।।

13- त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपंचं।

सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमि:।

किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं।

यद्युक्तमाचर भवानि तवेंगितं स्यात्।।

14- ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च।

संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धि:।

किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै।

कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ता:।।

15 धात्री धराधरसुते न जगद् बिभर्ति।

आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति।

सूर्योsपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते।

त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि।।

16- ब्रह्माsहमीश्वरवर: किल ते प्रभावा-।

त्सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्या:।

केsन्ये सुरा: शतमखप्रमुखाश्च नित्या।

नित्या त्वमेव जननी प्रकृति: पुराणा।।

17- त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं।

जानेsहमद्य तव सन्निधिग: सदैव।

नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो।

विश्वात्मधीरति तम:प्रक्रति: सदैव।।

18- विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां।

शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव।

त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरूपा।

मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके।

19- गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव।

स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।

आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या।

संजीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्।।

20- मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपंचं।

तेषां गता: खलु यतो ननु जीवभाम्।

अंशा अनादिनिधनस्य किलानघस्य।

पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरंगा:।।

21- जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं।

त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।

नाट्यं नटेन रचितं वितथेsन्तरंगे।

कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा।।

22- त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धे-।

स्त्वामम्बिके सततमेमि महार्तिदे च।

रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते।

मामेव पाहि बहुदु:खकरे च काले।।

23- नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।

सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे।।

।। इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे तृतीयस्कन्धे विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं ।।


माता का महामंत्र श्लोक | DURGA MA KA MAHAMANTRA SHLOKA |

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्॥1॥

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धा˜यै नमो नम:। ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नम:॥2॥

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नम:। नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नम:॥3॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै। ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नम:॥4॥

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नम:। नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नम:॥5॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥6॥

या देवी सर्वभेतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥7॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥8॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥9॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥10॥

या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥11॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥12॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥13॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥14॥

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥15॥

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥16॥

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥17॥

यादेवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥18॥

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥19॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥20॥

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥21॥

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥22॥

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥23॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥24॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥25॥

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥26॥

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या। भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नम:॥ 27॥

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥28॥

स्तुता सुरै: पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।

करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:॥29॥

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।

या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति न: सर्वापदो भक्ति विनम्रमूर्तिभि:॥30॥

माता व संवत्सर से जुड़ी शायरी | MATA V SANVATSAR SE JUDI SHAYARI

ए वर्ष का ये प्रभात, बस खुशियां ही खुशियां लाए,

मिट जाउ सब मन का अंधेरा, हर पल बस रोशन हो जाए.
विक्रम संवत 2079 हिन्दू नववर्ष की बधाई !

नवरात्रि की बधाई | NAVRATRI WISHES

लाल रंग से सजा मां का दरबार,

हर्षित हुआ मन, पुलकित हुआ संसार,

अपने पावन कदमों से मां आए आपके द्वार,

शुभ हो आपको ये नवरात्रि का त्योहार

हिन्दू नव वर्ष बधाई सन्देश | HINDU NAV VARSH BADHAI SANDESH

नए पत्ते आते हैं, वृक्ष खुशी से झूम जाते हैं,

ऐसे मौसम में ही तो नया आगाज होता है,

हम यूं ही हैप्पी न्यू ईयर तुम जैसा नही मनाते

हमारे मनाने का अलग अंदाज होता है

नव वर्ष बधाई सन्देश शुभकामनाये | NAV VARSH BADHAI SANDESH SHUBHKAMNA

नव वर्ष की पवन बेला में, है यही शुभ संदेश,

हर दिन आए आपके जीवन में, लेकर खुशियां विशेष

नवरात्रि शुभकामना शायरी | NAVRATRI SHUBHKAMNA SHAYARI

नव कल्पना, नव ज्योत्सना, नव शक्ति, नव आराधना

हिंदू नववर्ष पर माता रानी आपकी पूर्ण करें मनोकामना |

हिन्दू नव वर्ष शायरी | HINDU NAV VARSH SHAYARI

दिल में बसाओ आने वाला कल,

हंसो और हंसाओ, चाहे जो भी हो पल,

खुशियां लेकर आएगा आने वाला कल

इस उम्मीद में जियो हर पल.

भक्ति आराधना माँ दुर्गा शायरी | BHAKTI ARADHANA MA DURGA SHAYARI |

जो भी दिल से पुकारा है उसका जीवन संवारा है
कोई जब साथ न देता मैया तेरा सहारा है
सभी की कामना पूर्ति सदा करती तुम्ही माता,
भले ही छोड़ दे बच्चे माँ ने उन्हें कब बिसारा है

jo bhee dil se pukaara hai usaka jeevan sanvaara hai 
koee jab saath na deta maiya tera sahaara hai 
sabhee kee kaamana poorti sada karatee tumhee maata, 
bhale hee chhod de bachche maan ne unhen kab bisaara hai |

नव संवत्सर ख़ुशी शायरी भक्ति कल्याण शायरी | NAV SANVTSAR KHUSHI SHAYARI BHAKTI KALYAN SHAYARI

नव संवत्सर के अवसर पर ख़ुशी मनाने आया है,
माँ दुर्गा ये भक्त तेरा तुम्हे पुष्प चढ़ाने आया है,
तन मन सब अर्पण बस भक्ति का वरदान मिले,
हो सबका कल्याण सदा ये तुमसे पाने आया है |

nav sanvatsar ke avasar par khushee manaane aaya hai, 
maan durga ye bhakt tera tumhe pushp chadhaane aaya hai, 
tan man sab arpan bas bhakti ka varadaan mile, 
ho sabaka kalyaan sada ye tumase paane aaya hai |

आदिशक्ति जगतजननी जग्दम्बा शेरावाली शायरी | AADI SHAKTI JAGATJANANI JAGDAMBA SHERAWALI SHAYARI |

आदि शक्ति जगत जननी इस जग का आधार तुम्ही,
तुमसे ये चलती दुनिया हो विश्व की पालनहार तुम्ही,
इस स्वार्थ भरी दुनिया में है कौन हमें जो अपनाये ,
जान अबोध बालक हमको कर लो ना स्वीकार तुम्ही |

aadi shakti jagat jananee is jag ka aadhaar tumhee, 
tumase ye chalatee duniya ho vishv kee paalanahaar tumhee, 
is svaarth bharee duniya mein hai kaun hamen jo apanaaye , 
jaan abodh baalak hamako kar lo na sveekaar tumhee |

Read More:

Radha Krishna Love Shayari ( राधा कृष्णा शायरी)

Maa Shayari in hindi | माँ शायरी हिंदी में

Leave a Comment